शनिवार, 6 मार्च 2010

मासूमियत की हत्या कबतक


कुछ दिनों से मन में बड़ी उथल-पुथल चल रही है। थोड़ी निराशावादी होती जा रही है लेकिन मैं अच्छे से जानती हूं कि यह निराशा मेरे लिए कितनी खतरनाक है। चलो छोड़ो इन बातों में क्या रखा आपको एक बार फिर अनके जीवन के एक ओर अनुभव से परिचित कराती हूं। जो हमें इस बात का एहसास कराएंगा कि हमने अपनी सोच कितनी बदली है। हमारे समाज में क्या परिवर्तन आया है। हम कई जगह कितने कमजोर हो जाते हैं। चाहते हुए भी हमारे हाथ बंध जाते हैं। ये अिनुभव इसी का सबूत है।
बात कुछ दिन पुरानी है जब में अपने घर भिण्ड गई हुई थी, अब तो दादी के पास जाना ही कम हो पाता है। कभी-कभार जरूर शादी में शरीक होने चली जाती हूं और तभी दादी से मिलना हो पाता है। आज का किस्सा भी एक नाबालिक लड़की की शादी का है, जो वाकई बहुत मासूम लग रही थी लेकिन वो अपनी इस बाली उमर की खुशी में अपने भविष्य को समझ पाने में असर्मथ थी। वैसे मेरा शादी में जाने का बिल्कुल मन नहीं था लेकिन दादी की जिद के आगे मुझे झुकना ही थी। फिर उस छोटी सी दुल्हन को देखने की जिज्ञासा मुझमें भी थी। शादी में गई उस दुल्हन को भी देखा और उससे तसल्ली से बैठकर बात भी की। वो तो मुझे देखकर उतनी ही उत्सुक और अल्हड़ थी जितनी की दो साल पहले दस-ग्यारह वर्ष की उम्र में अपनी दीदी की शादी में थी। मेरे कुछ पूछने से पहले ही वह अपनी ससुराल के गुण गान करने में लगी रही। दीदी वो बहुत अच्छे हैं। मेरी सास मेरे लिए पहले ही बहुत सुन्दर साड़ी लाई थी। सुबह मेरी ननद का फोन आया था। उन्होंने मेरे लिए चढ़ाए की सारी साड़ी और ज्वेलरी ग्वालियर से ही खरीदी है। बहुत पैसा है उनके पास। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। दादी को पता था कि मै बाल विवाह के खिलाफ बोलती हूं इसलिए उन्होंने इस डर से की कहीं ये किसी से कुछ कह न दे जल्दी ही मुझे आवाज लगा दी। चलों राखी खाना खा के घर चलते हैं। मैं एकदम चुपचाप सिर्फ उस मासूम के बारे मैं सोच रही थी। तभी वहां औरतों में होती बातचीत से मुझे मालूम हुआ इस तेरह साल की लड़की का दुल्हा लगभग तेतीस साल का है। पर वो इन सबकी परवाह किए बगैर गहने पहनने की खुशी में पागल थी। अगले ही पल वहां बैठी औरतों के बीच बालिका-बधु सीरियल की चर्चा शुुरू हो गई। सभी महिलाएं सीरियल के एक-एक मुद्दे पर बात कर रहीं थी। लेकिन किसी का भी ध्यान उस सच की बालिका-बधु पर नहीं था जो कुछ ही दिनों में अपने इस बचपन से बाहर निकलकर जिम्मेदारियों के बोझ तले दबने वाली है। नाही किसी को ये ध्यान है कि ये मासूम इस कच्ची उम्र में किसी के घर का चिराग देने में अपनी जान भी दाव पर लगा सकती है। उसकी स्वयं की मां ने जब इस बात से आंख मीच ली है तो कौन है जो उसकी फिक्र कर सके। अब सोच रही थी कितना सार्थक है यह सीरियल?

क्रमशः....................

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच में जो समाज का आइना होते हैं ये धारावाहिक लेकिन पता नहीं फिर भी लोग क्यों समझ नहीं पाते हैं,आँखों देखा हाल की सुन्दर अभिव्यक्ति.
    विकास पाण्डेय
    www.विचारो का दर्पण.blogspot.com

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  2. सही कहा अपने... कैसे कोई अपनी १३ साल की लड़की की शादी ३३ साल के युवक से कर सकती है... ये न तो माँ का फैसला हो सकता और न ही बाप का.... इसके पीछे कोई बड़ी वजह हो सकती है.... यथा गरीबी, सामाजिक स्थिति और अन्य...........

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