शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2009

ख़ुद को तलासती मैं

कभी कभी मन जब बहुत उदास हो जाता है तो यूं ही अपनी डायरी लेकर बैठ जाती हूं और कुछ पन्ने काले कर लेती हूं। ऐसी ही कुछ पलों में मन की पीडा को श्ब्दों में ढ़ाल दिया। अच्छा और सच्चा लगे तो जरूर बताना।
अंजानी सी मैं मतवाली।
सीधी-साधी मैं भोली-भाली।।
न समझूं ये जग की लीला।
छल प्रपंच और मन का कीला।।
चलती जाती अपनी धुन में।
नियति गति पर, ईश्वर की सुन में।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. bahut sundar....
    bas hume apni hi dhun mei chalna chahiye, bas dhun thik hona chahiye.........
    best of luck

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  2. bahut khoob dost lakin .....you are a journalist should deffiniately knows ur self ...if u know ur self than you can service in this world....

    keep writing u r a fine journalist.....go for it...

    Jai Ho mangalmay ho

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  3. बहुत गहराई से लिखती हैं आप शब्दों मे डूबकर
    अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर....



    माफ़ी चाहूंगा स्वास्थ्य ठीक ना रहने के कारण काफी समय से आपसे अलग रहा

    अक्षय-मन "मन दर्पण" से

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  4. bahut badhiya hai, choti magar meaningful hai. keep it up.

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  5. apni samvednao ko yatharth ke dharatal pr utre, nwodit rachnakaro- patrakaro ko protsahit karna chahiye.

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  6. Bahut sunder likhatin hain aap....aapke blog par aakar bahut achchha laga..!

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  7. बहुत सुन्दर रचना
    बहुत बहुत बधाई .....

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  8. कुछ खास नहीं. बाल-कविता है. गंभीरता का अभाव है. अच्‍छी कविताएं लिखने के लिए कविताएं पढने की आदत भी डालनी चाहिए.

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