गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

मस्त राम मस्ती मै

अभी कुछ दिन पहले ही मैं अपने दोस्तों के साथ दीनदयाल शापिंग मांल गई थी मांल की भव्यता देखकर बहुत अच्छा लग रहा था और मन मैं ख्याल आ रहा था कि क्या हम १० साल पहले तक इसका आन्नद ले सकते थे? शायद नहीं भारत जिसकी लगभग ७०% जनता गाँवों मैं निवास करती है और हम भी कंही न कही उनमे से ही एक है लेकिन जो सच्चे अर्थो मै गावो से जुड़े है उन ग्रामवासियों के लिए ये मांल कितने आन्नददायक है इस बात का अंदाजा मैंने वहाँ घूमने आये गावों के लोंगो को देखकर लगाया एक परिवार जिसमे दो औरते दो बच्चे और एक आदमी था वे सभी चकित होकर मांल के चारो और देख रहे थे जैसे वे कोई जादू कि नगरी मैं आ गए हो मैं भी उनकी उत्सुकता को देखकर उनकी और देखे जा रही थी थोडी देर बाद मैंने देखा कि वे सभी को एकटक देख रहे थे उनके अन्दर मध्यमबर्गियो की तरह दिखाबा नहीं था उन्हें हाई क्लास की तरह दिखने का शौक भी नहीं था उनमे से आदमी जो अपने छोटे छोटे दो लड़को साथ लिए था नीचे ग्राउंड फ्लोर पर जाने के लिए एक्सरिलेटर पर बैठ गया और वे सभी तालिया बजाते हुए नीचे आने लगे उन सभी क अन्दर झिझक नहीं थी और न हीं कोई झूठे दिखावे का शौक वे सभी जो कुछ कर रहे थे अपनी मस्ती मैं ही मग्न होकर जब एक्सरिलेटर से उतरते मैं उन्हें झटका लगा तो वे समझा गए थे जल्दी से उतरना होगा और और करीब तीन चार बार वे सभी चढ़े और उतरे और उतरने पर कुंदे भी इतने मैं वहा मौजूद गार्ड ने आकर उन सभी रोका और बाहर का रास्ता पूछकर वे सभी बाहर चले गए शायद वे सभी अपने किसी रिश्तेदार के साथ यहाँ आए थे उनकी भेषभूषा मै भी किसी तरह का दिखाबा नही था और थोडी देर बाद हम सभी भी बाहर आ गए और अपने अपने घर चले गए

5 टिप्‍पणियां:

  1. achhi abhivayakti ki....vaise mere blog par padharne ke liye shukriya...aate rahna....waise bhi hum ek hi biradri ke hai...Journalist.....


    Jay HO Magalmay Ho...

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  2. अच्छा लिखा है आपने !

    इसी तरह अपने अनुभवों को ब्लॉग के जरिये
    हमसे बांटते रहिये !

    शुभकामनाएं !

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  3. samaj ko dekhne ki drasti viksit ho rahi hai.. har cheej ko or kareeb se dekho.. bahut kuch naya milega. khoob likha hai tumne.. badhai

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  4. aapka blog padhkar achcha laga. agar aap currunt issues par likhen to or bhi khushi hogi, khaskar social issues par. all the best. Ravi.

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  5. बिल्कुल सही बात है ,हम देखावे के आडम्बर में अपनी प्रसन्नता खोते जा रहे हैं / ""सबसे बड़ा रोग ,क्या कहेंगे लोग ""

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