सोमवार, 22 मार्च 2010

अब भी संभल जाओ....जल संरक्षण


आज विश्व जल दिवस है। हममें कई ऐसे लोग होंगे जिनको ये नहीं मालूम होगा। तीन दिन पहले मुझे भी नहीं मालूम था। शनिवार को नेट पर बैठे-बैठे सर्चिंग कर रही थी तभी अचानक मेरी नजर इस ओर गई और मैं इससे संबधित डाटा देखने में जुट गई।

यूं तो मैं अक्सर ही घर में सबको पानी बचाने की सलाह देती रहती हूं। पर उस पर उतना अमल नहीं हो पाता जितना होना चाहिए। अब मन मैं चलते विचारों में वे सभी तस्वीरों साकार हो रही थी जो अक्सर जल संरक्षण के लिए बनी पेटिंग्स में देखा करती थी। हमारे घर में तो पानी की कोई कमी नहीं इसलिए शायद इसकी कमी का उतना एहसास नहीं कर सकती जितना कि वह जिसने इसे झेला है। हमारे यहां लाइट चले जाने पर पानी न आने की आहट ही सबको हिला देती है।

चलो आज आपको उन आंकड़ों से परिचित कराते हैं, जो आपको भी एक बार पानी की बचत के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दें।

पृथ्वी पर जल की मात्रा-
पृथ्वी की सतह पर पानी समुद्र, नदियों, झीलों से लेकर बर्फ से ढके क्षेत्रों के रूप में मौजूद है। पानी का सबसे बड़ा स्रोत समुद्र है जहां धरती का 97.33 प्रतिशत पानी पाया जाता है। समुद्र के पानी में अनेक प्रकार के लवण एवं खनिज घुले होते हैं जिसकी वजह से वह खारा होता है। भार के अनुसार समुद्र जल में 3.5 प्रतिशत खनिज होते हैं। हमारी धरती की सतह का 70.8 प्रतिशत भाग पानी से घिरा है। धरती के कुल पानी का 2.7 प्रतिशत से भी कम हिस्सा सादा जल है जो हमारे उपयोग का है। सादा जल का अधिकांश हिस्सा ध्रुवीय प्रदेशों में बर्फ के रूप में जमा है। दक्षिण ध्रुव में पानी की मात्रा कहीं ज्यादा है। यहां करीब एक करोड़ पचास लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बर्फ से ढका है। यह क्षेत्र पूरे भारत के क्षेत्रफल से लगभग पांच गुना ज्यादा है। 22 मार्च को विश्व जल दिवस है और इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं है।
22 मार्च यानि विश्व जल दिवस। पानी बचाने के संकल्प का दिन। पानी के महत्व को जानने का दिन और पानी के संरक्षण के विषय में समय रहते सचेत होने का दिन। आंकड़े बताते हैं कि विश्व के 1.४ अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। प्रकृति जीवनदायी संपदा जल हमें एक चक्र के रूप में प्रदान करती है हम भी इस चक्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चक्र को गतिमान रखना हमारी जिम्मेदारी है, चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। हम स्वयं पानी का निर्माण नहीं कर सकते अत: प्राकृतिक संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गंवाएं यह प्रण लेना आज के दिन बहुत आवश्यक है।
विश्व में पानी की अपव्ययता-
-मुंबई में रोज वाहन धोने में ही 50 लाख लीटर पानी खर्च हो जाता है।
-दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइप लाइनों के वॉल्व की खराबी के कारण रोज 17 से 44 प्रतिशत पानी बेकार बह जाता है।
-इजराइल में औसतन 10 सेंटीमीटर वर्षा होती है, इस वर्षा से वह इतना अनाज पैदा कर लेता है कि वह उसका निर्यात कर सकता है। दूसरी ओर भारत में औसतन 50 सेंटी मीटर से भी अधिक वर्षा होने के बावजूद अनाज की कमी बनी रहती है।
-पिछले 50 वर्षों में पानी के लिए 37 भीषण हत्याकांड हुए हैं।
-भारतीय नारी पीने के पानी के लिए रोज ही औसतन चार मील पैदल चलती है।
-जल जन्य रोगों से विश्व में हर वर्ष 22 लाख लोगों की मौत हो जाती है।
-हमारी पृथ्वी पर एक अरब 40 घर किलो लीटर पानी है। इसमें से 97.५ प्रतिशत पानी समुद्र में है, जो खारा है, शेष 1.५ प्रतिशत पानी बर्फ के रूप में ध्रुव प्रदेशों में है। इसमें से बचा एक प्रतिशत पानी नदी, सरोवर, कुओं, झरनों और झीलों में है जो पीने के लायक है। इस एक प्रतिशत पानी का 60 वां हिस्सा खेती और उद्योग कारखानों में खपत होता है। बाकी का 40 वां हिस्सा हम पीने, भोजन बनाने, नहाने, कपड़े धोने एवं साफ-सफाई में खर्च करते हैं।
-यदि ब्रश करते समय नल खुला रह गया है, तो पांच मिनट में करीब 25 से 30 लीटर पानी बरबाद होता है।
-बाथ टब में नहाते समय 300 से 500 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि सामान्य रूप से नहाने में 100 से 150 लीटर खर्च होता है।
-विश्व में प्रति 10 व्यक्तियों में से 2 व्यक्तियों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल पाता है।
-प्रति वर्ष 6 अरब लीटर बोतल पैक पानी मनुष्य द्वारा पीने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
-नदियां पानी का सबसे बड़ा स्रोत हैं। जहां एक ओर नदियों में बढ़ते प्रदूषण को रोकने के लिए विशेषज्ञ उपाय खोज रहे हैं वहीं कल कारखानों से बहते हुए रसायन उन्हें भारी मात्रा में दूषित कर रहे हैं।
-पृथ्वी पर पैदा होने वाली सभी वनस्पतियों से हमें पानी मिलता है।
-आलू में और अनन्नास में 80 प्रतिशत और टमाटर में 95 प्रतिशत पानी है।
-पीने के लिए मानव को प्रतिदिन 3 लीटर और पशुओं को 50 लीटर पानी चाहिए।
-1 लीटर गाय का दूध प्राप्त करने के लिए 800 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है, -एक किलो गेहूं उगाने के लिए 1 हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए 1 हजार लीटर और एक किलो चावल उगाने के लिए 4 हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इस प्रकार भारत में 83 प्रतिशत पानी खेती और सिंचाई के लिए उपयोग किया जाता है।
समय आ गया है जब हम वर्षा का पानी अधिक से अधिक बचाने की कोशिश करें। बारिश की एक-एक बूंद कीमती है। पिछले सालों में तमिलनाडु ने वर्षाजल संरक्षण कर जो मिसाल कायम की है उसे सारे देश में विकसित करने की आवश्यकता है। हमें एक बार फिर मृत पड़े जलाशयों को जीवित करना होगा। इसके लिए हमें एकजुट होकर आगे आना होगा। अगर हमने ऐसा नहीं किया तो बहुत जल्द ही हमारी आंखों का पानी भी सूख जाएगा।

इसमें दिए गए आंकडे वाटर पोर्टल से लिए गए हैं।

7 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन। शानदार। बधाई। कहा भी जा रहा है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए ही होगा। देखना है कि यह कब तक टलता है। हम इसे टालने के लिए क्या कर रहे हैं यह यक्ष प्रश्न है।

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  2. निहारिकाजी,बहुत समय गुजर गए आपके लेख नहीं आ रहे.क्या बात है?आपने लिखना बंद कर दिया क्या ?

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  3. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

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